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स्मार्ट शहर स्मार्ट गांव के बिना जीवित नहीं रह सकता सम्पादकीय द्वारा- बलवंत सिंह खन्ना….

कोरोना कोविड-19 महामारी के चलते विश्व के अनेक देशो में अभी लॉक डाउन चल रहा है इससे हमारा देश और हमारा राज्य भी अछूता नहीं है।वैसे भारत में 24 मार्च से लेकर 14 अप्रैल तक उसके बाद 15अप्रैल से 3 मई तक लॉक डाउन है। यहाँ कहना गलत नहीं होगा की जब तक इस महामारी का कोई स्थाई इलाज नहीं मिल जाता है तब तक स्थिति पहले जैसे होना सम्भव नहीं है। लॉक डाउन से बेशक हमने इस महामारी को फैलने में नियंत्रण पा गए हैं। लेकिन इसका खतरा तब तक बना रहेगा जब तक इसका इलाज नहीं मिल जाता।आज हर क्षेत्र बंद है कुछ आवश्यक क्षेत्र(दवाई,राशन,फल,दुग्ध) को छोड़कर। बड़े- छोटे सभी उद्योग, यातायात, मनोरजन, विद्यालय-महाविद्यालय सभी बंद है। लेकिन फिर भी शहर हो या ग्रामीण जीवन सफर तो चल ही रहा है, हमे आवश्यक वस्तुओ की उपलब्धता हो पा रहा है। आखिर कोई तो होंगे न जिनके बुते आज हम इस महामारी से लड़ पा रहे हैं। इसका मुख्य श्रोत है हमारे देश के उत्पादनकर्ता कौन हैं यह उत्पादनकर्ता जिनके अथक प्रयास,मेहनत लगन के बलबूते मानवजीवन चलायमान है? यह हैं हमारे ग्रामीण परिवार, ग्रामीण किसान जिनके मेहनत से आज शहरो में सभी प्रकार के खाद्य पदार्थो की उपलब्धता सुनिश्चित हो पा रहा है। 2014 से भाजपा सरकार आने से हमारे प्रधानमन्त्री जी द्वारा स्मार्ट शहर पर कई योजनाये सुने हैं। स्मार्ट शहर अर्थात उन शहरों में चमचमाती सड़कें और उस पर दौड़ती कारों का रेला , बड़े-बड़े शॉपिंग मॉल यानी कि बाजार केंद्र , चौबीसों घंटे बिजली , पानी , टेलीविजन, एसी, मोबाइल और ढेरों इलेक्ट्रानिक उपकरण , 4जी इंटरनेट , । यह सब कुछ तो ह परंतु सवाल है कि क्या केवल इनसे व्यक्ति का जीवन चल सकता है? क्या सड़कें, बिजली, बाजार और इलेक्ट्रानिक यह सब हो सकते हैं लेकिन क्या उपकरण मनुष्य का पेट भर सकते हैं? क्या ये शहर अपनी आवश्यकता के लिए बिजली का उत्पादन करने में समर्थ हैं? क्या ये शहर अपनी आवश्यकता का भोजन और पानी अपने दम पर जुटा सकते हैं? इन सभी सवालों के जवाब है नहीं । यानी हमें सुविधाएं तो चाहिएं, लेकिन उसका उत्पादन कहीं और होगा। यह ‘कहीं और’ कहां होगा, यह होगा गांवों में। यह इकलौती बात विकास की इस दौड़ में गांवों के महत्व को परिलक्षित करती है। बिना स्मार्ट ग्राम के स्मार्ट शहर की कल्पना करना गुनाह होगा।पहली बात तो यह स्पष्ट है कि शहरों को उपभोक्ता ही माना जा रहा है, उत्पादक नहीं। दूसरी बात यह है कि बढ़ते शहरीकरण से केवल केंद्रीकृत अर्थ व्यवस्था को बल मिलता है और तीसरी बात यह है कि शहरों को परजीवी के रूप में ही देखा जाता है।
यही कारण है कि शहरों के प्रति पर्याप्त से अधिक आकर्षण होने के बाद भी शहरीकरण को एक समस्या के रूप में ही देखा जाता है और एक सीमा से अधिक शहरीकरण को उचित नहीं माना जाता।
शहरों में खाद्य सामग्री का उत्पादन नहीं हो सकता। कृषि या खेती गांवों में होती है शहरों में नहीं। वास्तव में शहर और गांव का मुख्य अंतर भी आजीविका के साधन हैं। गांवों में आजीविका का मुख्य साधन खेती है तो शहरों में भारी उद्योग-धंधे। यह एक सच्चाई है कि भोजन किए बिना मनुष्य नहीं रह सकता और भोजन की सभी खाद्य सामग्री खेतों में ही पैदा होते हैं, कारखानों में नहीं। दूध पाने के लिए एक बार फिर हमें गांवों की ओर ही देखना पड़ता है। गोशालाएं तक भी गांवो से जुड़े शहरों के बाहरी इलाकों में ही चलाई जातीहैं।
यदि विकास के केंद्र में शहरों की बजाय गांवों को रखा गया होता तो उद्योग-धंधों की बजाय खेती को केंद्र मान कर विकास की पूरी संरचना बनाई जाती। इससे शहर यानी कि उपभोक्ता वर्ग कम पैदा होता और गांव यानी कि उत्पादन की संख्या बढ़ती। जनता के पैसों से दिये गए अनुदानो से शहरों के उपभोक्ता जीवन को सरल और आकर्षक बनाया गया जिससे गांवों का उत्पादक वर्ग उसी ओर आकृष्ट होने लगा। शहरों के फैलाव और उद्योग-धंधों के विकास के लिए खेतीहर जमीनें ले ली गईं और उन खेतीहर जमीनों से बेदखल हुए किसानों को मजदूर बना कर उनके जीवन को अनुत्पादक बना दिया गया। इसका ही परिणाम खाद्य सुरक्षा और मंहगाई है। इसलिए यदि इन दो समस्याओं से छुटकारा पाना है तो उत्पादक वर्ग को महत्ता देनी होगी। शहरी उपभोक्ता वर्ग को उत्पादन की ओर प्रेरित कर उन्हें अपने उपभोग की सामग्री स्वयं पैदा करने के लिए विवश करना होगा। तभी गांवों से शहरों की ओर पलायन रूकेगा।
शहरीकरण से दो बड़ी समस्याएं पर्यावरण और स्वास्थ्य की पैदा हुई हैं। शहर मुख्यतः उद्योग केंद्रित होता है और तमाम बड़े उद्योग पर्यावरण के लिए समस्या हैं। साथ ही शहरों की जीवन शैली भी पर्यावरण के लिए खतरा है। जीवन का सर्वोत्तम सिद्धांत जो आज तक विकसित किया गया है, वह यही है कि प्रकृति से आप जितना लें, उतना ही उसे वापस भी दें। परंतु शहरों की मनोवृत्ति केवल और केवल लेने की रही है, देने की नहीं। अधिकांश बड़े शहरों में पीने का अपना पानी उपलब्ध नहीं है। उनके पीने का पानी दूसरे इलाकों और अधिकांशतः ग्रामीण इलाकों से आता है। परंतु अधिकांश शहरवासी उस पीने के पानी का अत्यधिक दुरूपयोग करते हैं जिसका परिणाम उन ग्रामीण इलाकों को झेलना पड़ता है।
इसी प्रकार शहर के उद्योग-धंधों को चलाने के लिए बड़े पैमाने पर बिजली की आवश्यकता पड़ती है। बिजली का उत्पादन किसी शहर में नहीं होता। यह होता है कोयले से और नदियों पर बांधों से। दोनों ही उपाय खेती को नष्ट करते हैं। जो नदियां कभी सभ्यता के विकास का केंद्र हुआ करती थीं, और जिनके किनारे बड़ी-बड़ी सभ्याताएं पनपा करती थीं, वे आज सूखने के लिए अभिशप्त हैं और विस्थापन व उजाड़ के लिए जानी जाने लगीं हैं। उनसे जो बिजली निकाली जाती है, वह वहीं के ग्रामीण इलाकों के बजाय दूर के शहरों के लिए होती है। गांवों की नदियों से निकाली गई बिजली से शहर तो चमकाए जा रहे हैं, परंतु गांवों को अंधेरे में रखा जा रहा है। गांवों का प्रकृतिकेंद्रित जीवन स्वाभाविक रूप से प्रदूषणमुक्त होता है। प्रदूषणमुक्त होने से स्वास्थ्य की भी समस्याएं कम होती हैं। ताजी सब्जियां, ताजे फल और पौष्टिक अनाज स्वास्थ्य को स्थिरता प्रदान करते हैं। गांवों की श्रम आधारित जीवन शैली भी एक स्वास्थ्यकर होती है
शहरीकृत विकास की एक प्रमुख समस्या आवास की है। छोटे से क्षेत्रफल में बड़ी संख्या में लोग रहते हैं। स्वाभाविक ही है कि आवास की समस्या पैदा होगी। आवास से जुड़ी हुई समस्या है स्वच्छता की। भारत में बनाया गया सीवेज तंत्र बुरी तरह असफल रहा है और प्रदूषण का बहुत बड़ा कारण भी है। यह एक सच्चाई है कि बड़ी संख्या में लोगों को विलासितायुक्त जीवन नहीं मिल सकता। यही कारण है कि जहां कहीं भी शहरों में बड़ी-बड़ी कोठियां हैं, उनके ठीक बगल में उनको आधारभूत सुविधाएं प्रदान करने वाली झुग्गी-झोपड़ी बस्तियां भी हैं। झुग्गी-झोपड़ी बस्तियां आज सभी शहरों की अनिवार्य सच्चाई व बुराई बन चुकी हैं। शहरवासी इनसे घृणा करते हैं, परंतु इनके बिना जीवन भी नहीं चला सकते। उनके कारों को चलाने वाले ड्राइवर, उनके घरों में काम करने वाली बाई, उनकी नालियों और सीवेज की सफाई करने वाले मेहतर, उनके कारखानों में काम करने वाले मजदूर सभी इन्हीं झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों में रहते हैं। इन झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों में वे सभी समस्याएं होती हैं, जिनसे बचने के लिए गांववासी शहर भाग कर आते हैं।
समस्या गंभीर है इससे अवश्य बचा जा सकता है और जिसप्रकार से हमारे राज्य में कोरोना का इलाज हो रहा है उसको केवल हमारा देश ही नही अपितु शार्क देशो ने भी सम्मान दिया है और हमारे चिकित्सको के इलाज प्रणाली को अपना रहे हैं। छत्तीसगढ़ जो अधिकान्सतः ग्रामीण क्षेत्रो से घिरा हुआ है यहाँ का खान- पान, रहन- सहन से लोगो की रोगप्रतिरोधकता भी अन्य राज्यो से बेहतर साबित हो रहा है। इस लॉक डाउन में, गांव से शहर पलायन करने वाले भी अपने ऐश्वर्य जीवनशैली को छोड़कर गावों की ओर दौड़े चले हैं। क्यूंकि उनको पता है शहर में उपभोगता के रूप में रहने से बेहतर हैं अपने पैतृक स्थान पर जाकर उत्पादक के रूप में रहें, जहाँ का हर चीज शुद्ध है कम से कम शहर के अपेक्षा तो शुद्ध ही है। कोरोना से जंग जितने के बाद अवश्य हमे स्मार्ट शहर बनाना चाहिये जहाँ सबसे पहले बेहतर स्वास्थ्य सुविधा की उपलब्धता पहली प्राथमिकता होनी चाहिये। साथ ही स्मार्ट ग्राम के लिये भी कार्य किया जाना अति आवश्यक है जहा बेहतर बिजली, बेहतर सड़क,बेहतर बाजार, बेहतर इलाज,बेहतर शिक्षा ही पहिली प्रथमिकता होना चाहिये।जब तक हमारा ग्रामीण परिवेश स्मार्ट नहीं हो जाता तब तक स्मार्ट शहर की कल्पना करना व्यर्थ होगा। स्मार्ट शहर अगर देश की रीढ़ है तो स्मार्ट ग्राम उस रीढ़ को सीचने वाले रक्त होना चाहिये।
महात्मा गांधी जी का कल्पना जो गांवों को लेकर था उनका कहना था “मेरे देहात आज मेरी कल्पना में ही हैं। आखिर में तो हर एक मनुष्य अपनी कल्पना की दुनिया में ही रहता है। इस काल्पनिक देहात में देहाती जड़ नहीं होगा – शुद्ध चैतन्य होगा। वह गंदगी में, अंधेरे कमरे में जानवर की जिन्दगी बसर नहीं करेगा, मर्द और औरत दोनों आजादी से रहेंगे और सारे जगत के साथ मुकाबला करने को तैयार रहेंगे। वहां न हैजा होगा, न मरकी (प्लेग) होगी, न चेचक होंगे। कोई आलस्य में रह नहीं सकता है, न कोई ऐश-आराम में रहेगा। सबको शारीरिक मेहनत करनी होगी। इतनी चीज होते हुए मैं ऐसी बहुत-सी चीज का ख्याल करा सकता हूँ जो बड़े पैमाने पर बनेगी। शायद रेलवे भी होगी, डाकघर, तारघर भी होंगे।”

(लेखक बलवंत सिंह खन्ना, कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय रायपुर के समाज कार्य विभाग के पूर्व छात्र एवं युवा सामाजिक कार्यकर्ता के साथ-साथ स्वतन्त्र लेखक व समाजिक मुद्दों के विचारक हैं।)

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