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रीति-रिवाज से सम्पन्न विवाह से मिलता है वैधानिक अधिकार

वैवाहिक जीवन की सफलता के लिए आपसी सामंजस्य जरूरी

 

रायपुर /राष्ट्रीय महिला आयोग द्वारा प्रायोजित वेबिनार श्रृंखला के तहत छत्तीसगढ़ राज्य महिला आयोग द्वारा तथा आयोग की अध्यक्ष डाॅ. किरणमयी नायक के अगुवाई में आज के वेबिनार में युवोदय संस्थान के सहयोग से बस्तर संभाग के युवक एवं युवतियों ने भाग लिया।
आज ‘‘वैधानिक, अवैधानिक विवाह, विवाह से संबंधित कानून दुरूपयोग, परिणाम एवं दुष्परिणाम‘‘विषय पर वेबिनार आयोजित किया गया। इस वेबिनार में प्रश्नोत्तरी के जवाब आयोग की अध्यक्ष डाॅ. किरणमयी नायक ने दिया, कार्यक्रम के वक्ता श्रीमती मेघा टेम्बुल्कर एएसपी, सुश्री मीनल पराड़कर अधिवक्ता, फौजिया मिर्जा उच्च न्यायालय (डिप्टी एडवोकेट जनरल) अधिवक्ता रहे।

आयोग की अध्यक्ष डाॅ. किरणमयी नायक ने कहा कि महिला आयोग में कई मामले ऐसे आते है। जिसमें लड़कियां 18 वर्ष का इंतजार करती है फिर घर से भागकर शादी कर लेती है और बाद में शिकायत लेकर आती है। इसके लिए एक कहावत है खरबूजा चाकू पर गिरे या चाकू खरबूजे पर कटता खरबूजा ही है, यहां पर खरबूजा महिला है। तीनों धर्मों के विवाह के अलग-अलग प्रावधान है। यदि आप धार्मिक रीति रिवाज से शादी करते है तो वह वैधानिक माना जाता है। युवतियों को वर्तमान में पढ़-लिखकर अपना कैरियर बनाने पर विशेष ध्यान देना चाहिए। आजकल के युवक-युवतियां अवैधानिक विवाह कर लेते है उसके बाद दैहिक शोषण, दहेज प्रताड़ना का मामला दर्ज करा देते है। घर से भाग जाना, हिरोइन, माॅडल बनाने के सपने दिखाना उनका शोषण किया जाना ये सब होने के बाद लड़की न घर की रह पाती है और न ही कहीं और की। इसलिये अवैधानिक विवाह के चक्कर में ना पड़ें और अपना जीवन बर्बाद ना होने दें।

श्रीमती मेघा टेम्बुल्कर ने कहा हमारे भारत में विवाह संबंधी हिन्दू विवाह अधिनियम 1955 और विशेष विवाह अधिनियम 1954 है। विवाह एक ऐसा पवित्र बंधन है जो कि एक लड़के और लड़की को एक संबंध में पति पत्नी के रूप में जोड़ता है।विवाह से संबंधित होने वाले अपराधों को नियंत्रित करने के लिए सरकार द्वारा कई कानून पारित किये गये है। जिसमें लड़का और लड़की की एक निश्चित उम्र निर्धारित की गयी है।बाल विवाह पर प्रतिबंध लगाया गया ऐसा करने वालों के खिलाफ सजा का प्रावधान भी किया गया है।

सुश्री मीनल पराड़कर ने कहा हिन्दू विवाह एक संस्कार है।हिन्दू विवाह उस सूरत में अनुष्ठित किया जा सकेगा जब लड़का 21 वर्ष का एवं लड़की 18 वर्ष की आयु पूर्ण हो, मानसिक विकार से ग्रस्त न हो, विवाह और सन्तानोत्पत्ति के अयोग्य ना हो। हिन्दू विवाह अधिनियम 1955 में ऐसे व्यक्ति से विवाह जिसका पति या पत्नी जीवित हो अकृत एवं शून्य होता है। प्रथम पत्नी के जीवित रहते दूसरा विवाह अवैध माना जाता है। अग्नि के समक्ष वर और वधू को एक साथ सात फेरे व सात वचन लेना चाहिए तब यह विवाह पूरा माना जाता है। यदि वैधानिक रूप से विवाह करते है तो उसे कानूनी अधिकार प्राप्त होते है।जिससे भविष्य में विधि अधिकारों में इसका लाभ ले सकते है। विवाह से संबंधित कानून धारा 9 दाम्पत्य जीवन की पुर्नस्थापना, धारा 10 न्यायिक पृथ्ककरण, धारा 13 (अ) तलाक, धारा 13 (ब) आपसी सहमति से विवाह विच्छेद, घरेलू हिंसा धारा 498 (अ) दहेज प्रताड़ना, धारा 495 पहले से शादीशुदा होने की बात छुपाकर दूसरा विवाह करना।

फौजिया मिर्जा उच्च न्यायालय (डिप्टी एडवोकेट जनरल) अधिवक्ता ने वैधानिक और अवैधानिक विवाह के बारे में विस्तार से सभी विधिक प्रावधानों की जानकारी दिया।
इस वेबिनार में सभी प्रतिभागियों ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया और प्रश्नोत्तरी के समय में एक से बढ़कर प्रश्न किये जिनके समाधान डाॅ. किरणमयी नायक तथा कार्यक्रम के वक्ताओं ने किया।

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