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व्यंग्य : पुस्तैनी ज़मीन – लेखिका : राजेश्वरी साहू “संवादिनी”

व्यंग्य : पुस्तैनी ज़मीन – लेखिका : राजेश्वरी साहू “संवादिनी”

जज साहब के कक्ष के बाहर लोगों की भारी भीड़ जमा थी। हर चेहरे का अपना अलग भूगोल था—कहीं निराशा की गहरी खाइयाँ थीं, तो कहीं उम्मीद की आख़िरी बची हुई पगडंडी। सबकी निगाहें उस बंद दरवाज़े पर टिकी थीं, जिसके भीतर से कभी-न-कभी न्याय नाम का प्राणी बाहर निकलने वाला था।

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समय बीतता जा रहा था, पर श्रीमान के दर्शन नहीं हुए। संभव है उनकी भी अपनी विवशताएँ हों; आखिर वे भी उसी व्यवस्था का हिस्सा हैं, जहाँ समय की कीमत सिर्फ़ आम आदमी चुकाता है। बाहर खड़ी जनता बरसों से “तारीख़ पर तारीख़” का उपवास कर रही थी, और आज भी न्याय का व्रत खुलने का कोई संकेत नहीं था।

लोगों के पैरों ने जवाब देना शुरू कर दिया था। घुटने काँप रहे थे, मगर उम्मीद अभी भी ज़िंदा थी। रामू ने थके हुए हाथों से माथा पकड़ा और फर्श पर बैठ गया। उसे बैठता देख कुछ और लोग भी वहीं आकर टिक गए। जब दुख सुनने वाला कोई न मिले, तो अदालत का बरामदा ही लोकतंत्र का सबसे सच्चा मंच बन जाता है।

एक अधेड़ व्यक्ति गमछे से पसीना पोंछते हुए बोला,
“भाई, हम लोग किराया-भाड़ा खर्च करके आते हैं, दिनभर की मजदूरी भी जाती है। फिर घंटों इंतज़ार करो। ऊपर से साहब कभी छुट्टी पर, कभी मीटिंग में, कभी तारीख़ आगे। लगता है अदालत में न्याय भी कैलेंडर देखकर आता होगा।”

रामू ने धीरे से सिर उठाया।

“दुख तो सबके हिस्से में है भैया, लेकिन सबसे बड़ा दुख उस आदमी का होता है जिसकी खून-पसीने की कमाई और पुरखों की छोड़ी हुई ज़मीन पर कोई दूसरा मालिक बन बैठे। यह कब्ज़ा रातों-रात नहीं होता। पहले बंदोबस्त में एक छोटी-सी ‘गलती’ होती है, फिर रिकॉर्ड में ‘सुधार’ होता है, फिर कोई ज़रूरी कागज़ ‘गायब’ हो जाता है। और देखते-देखते असली मालिक अदालत में अपनी ज़मीन साबित करता फिरता है, जबकि नकली मालिक उस पर फसल काट रहा होता है।”

पास बैठा दुबला-पतला आदमी, जो काफी देर से अपनी पुरानी फाइल सीने से लगाए बैठा था, भर्राई आवाज़ में बोला,

“भाई साहब, मेरे पास आधा एकड़ पुस्तैनी ज़मीन थी। बाप-दादा की वही आख़िरी निशानी। दफ़्तर में एक छोटी-सी ‘त्रुटि’ हुई, फिर कुछ लोगों की बड़ी-बड़ी मेहरबानियाँ हो गईं। देखते-देखते ज़मीन दूसरे के नाम चढ़ गई। दफ़्तरों के चक्कर लगाते-लगाते चप्पल घिस गई, घर के बर्तन बिक गए, बच्चों की पढ़ाई छूट गई; मगर फ़ाइल की धूल कम नहीं हुई। लगता है यहाँ इंसान बूढ़ा जल्दी होता है, फाइलें उससे भी ज़्यादा लंबी उम्र जीती हैं।”

बरामदे में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।

यह वही व्यवस्था थी जहाँ कई लोग टूट जाते हैं। कुछ लोग संघर्ष छोड़ देते हैं, कुछ मुक़दमे, और कुछ उम्मीद। व्यवस्था की उदासीनता कभी-कभी लोगों को ऐसे मोड़ पर पहुँचा देती है जहाँ उन्हें अपना भविष्य पूरी तरह अंधकारमय दिखाई देने लगता है।

इतने में हलचल हुई।

पेशकार ने ऊँची आवाज़ लगाई,
“जज साहब आ गए हैं… सब लोग अपनी-अपनी बारी का इंतज़ार करें।”

अदालत का दरवाज़ा खुला। लोग अपनी-अपनी फाइलें ऐसे सीने से लगाए खड़े हो गए, मानो उनमें कागज़ नहीं, पूरी ज़िंदगी रखी हो। हर नाम पुकारे जाने पर किसी की धड़कन तेज़ होती, तो किसी की उम्मीद थोड़ी और कम।

कुछ देर बाद आवाज़ आई—

“रामू लाल!”

रामू ने गहरी साँस ली और भीतर चला गया।

थोड़ी देर बाद दरवाज़ा खुला। सबसे पहले एक व्यक्ति बाहर निकला। चेहरे पर चौड़ी मुस्कान, हाथ में कागज़ों का पुलिंदा और बाहर खड़ी चमचमाती नई कार उसका इंतज़ार कर रही थी। वह आराम से कार में बैठा और धूल उड़ाता हुआ निकल गया।

उसे जाते देख एक बुज़ुर्ग धीमे से बुदबुदाए,

“यही है वह भूमाफिया… जिसने कागज़ों की खेती करके न जाने कितनों की पुस्तैनी ज़मीनें अपने नाम उगा लीं।”

कार आँखों से ओझल हो गई।

कुछ देर बाद रामू बाहर निकला। उसकी आँखें भीगी थीं। ऐसा लग रहा था जैसे अदालत से आदमी नहीं, उसकी आख़िरी उम्मीद बाहर आई हो।

लोग दौड़कर उसके पास पहुँचे।

“क्या हुआ भाई? सत्य जीता या झूठ?”

रामू फीकी मुस्कान के साथ बोला,

“फैसला तो हो गया… पर न्याय अभी भी रास्ता पूछ रहा है। अदालत ने कहा कि ज़मीन उसकी है और मुझे अपना कब्ज़ा छोड़ देना होगा। अब सोच रहा हूँ कि सच को झूठ मान लूँ या झूठ को सरकारी सच। लड़ने के लिए न पैसे बचे हैं, न ताकत।”

वह कुछ पल चुप रहा, फिर बोला,

“इस देश में सबसे ज़्यादा लाचार वह आदमी होता है जिसका जीवन राजस्व के कागज़ों में फँस जाता है। वहाँ फ़ाइलें चलती कम हैं, चलाई ज़्यादा जाती हैं। असली मालिक अपनी ज़मीन का नक्शा लेकर भटकता रहता है और नकली मालिक उसी ज़मीन पर मकान का नक्शा पास करा लेता है।”

रामू ने अपनी पुरानी फाइल सीने से लगाई और अंतिम वाक्य कहा—

“पुरखों ने ज़मीन हमारे नाम छोड़ी थी, व्यवस्था ने कागज़ किसी और के नाम लिख दिए। ज़मीन आज भी हमारी है, दस्तावेज़ भी हमारे हैं… बस सरकारी रिकॉर्ड और भूमाफिया की दोस्ती हमसे ज़्यादा मज़बूत निकली।हमारी जेब में सिर्फ़ कागज़ थे, नोट नहीं; शायद इसलिए कागज़ भी हमारे नहीं रहे।

लेखिका –राजेश्वरी साहू “संवादिनी”