पार्किन्सन का उपचार केवल दवाओं तक सीमित नहीं, फिजियोथेरेपी और समग्र दृष्टिकोण है जरूरी: इट्सा हॉस्पिटल्स




रायपुर। विश्व पार्किन्सन दिवस के अवसर पर राजधानी के इट्सा हॉस्पिटल्स (Itsa Hospitals) में विशेषज्ञों द्वारा एक विशेष प्रेस वार्ता का आयोजन किया गया। इस दौरान न्यूरोलॉजी, फिजियोथेरेपी, स्पीच थेरेपी और मनोविज्ञान विभाग के विशेषज्ञों ने पार्किन्सन रोग के बढ़ते जोखिमों, शुरुआती लक्षणों और आधुनिक उपचार पद्धतियों पर विस्तृत जानकारी साझा की।
25 की उम्र में भी दस्तक दे रहा है पार्किन्सन
न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. अभिजीत कुमार कोहट ने चौंकाने वाला तथ्य साझा करते हुए बताया कि पार्किन्सन अब केवल बुजुर्गों की बीमारी नहीं रह गई है। आजकल 25 वर्ष तक के युवाओं में भी इसके मामले देखे जा रहे हैं, जिसका मुख्य कारण आनुवंशिक हो सकता है। डॉ. कोहट ने कहा कि लिखावट का छोटा होना (माइक्रोग्राफिया), आवाज का धीमा होना, चेहरे के भाव कम होना और सूंघने की क्षमता में कमी इस रोग के शुरुआती संकेत हो सकते हैं। उन्होंने बताया कि शुरुआती 5 वर्षों के ‘हनीमून पीरियड’ के बाद जब दवाओं का असर कम होने लगता है, तब डीप ब्रेन स्टिमुलेशन (डीबीएस) सर्जरी एक प्रभावी विकल्प साबित होती है, जो दवाओं की निर्भरता को 50% तक कम कर सकती है।
अनियंत्रित डायबिटीज बढ़ा सकती है खतरा
इंटरनल मेडिसिन विशेषज्ञ डॉ. राजकुमार बरनवाल ने बताया कि लंबे समय तक अनियंत्रित डायबिटीज, मोटापा और निष्क्रिय जीवनशैली मस्तिष्क में वेस्कुलर डैमेज पैदा कर पार्किन्सन के जोखिम को बढ़ा सकती है। उन्होंने बुजुर्ग मरीजों को ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल नियंत्रित रखने की सलाह दी।
पुनर्वास के लिए अंतरराष्ट्रीय तकनीक ‘LSVT’
फिजियोथेरेपी विभाग की एचओडी डॉ. तनुश्री नेरल ने बताया कि अस्पताल में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त ‘LSVT BIG’ प्रोग्राम के जरिए मरीजों के मूवमेंट्स और बैलेंस में सुधार किया जा रहा है। वहीं, स्पीच थेरेपिस्ट जितेश कुमार ठाकुर ने ‘LSVT LOUD’ तकनीक की जानकारी दी, जो मरीजों की आवाज को स्पष्ट करने और सुरक्षित तरीके से भोजन निगलने में मदद करती है।
मानसिक स्वास्थ्य की अनदेखी न करें
मनोवैज्ञानिक एशिका जायसवाल ने रेखांकित किया कि पार्किन्सन केवल चाल-ढाल को ही नहीं, बल्कि सोचने और महसूस करने के तरीके को भी बदल देता है। उन्होंने अवसाद, चिंता और व्यवहारिक बदलावों के सही आकलन पर जोर दिया। अस्पताल के विशेषज्ञों ने सामूहिक रूप से यह संदेश दिया कि “जल्दी पहचान और निरंतर देखभाल” के जरिए पार्किन्सन के मरीज भी एक सामान्य और सम्मानजनक जीवन जी सकते हैं।











