छत्तीसगढ़ की भूगर्भिक संरचना के बारे में जानिए

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छत्तीसगढ़ की भूगर्भिक संरचना के बारे में जानिए
छत्तीसगढ़ की भूगर्भिक संरचना के बारे में जानिए

परिचय _ छत्तीसगढ़ राज्य दक्कन के प्राचीन पत्थर का अंश है पर्वत निर्माणकारी शक्तियों के कारण विस्तृत भागों का स्थान तथा कहीं-कहीं भैंसों के कारण भूमि धसने के परिणाम पाए जाते हैं

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भूवैज्ञानिक संरचना_ पृथ्वी के आंतरिक भाग की सिल की बनावट कैसी है और वह कि कल की बनी है छत्तीसगढ़ में धरवाड़ कम की चट्टानों से हल्की एवं रेतीली मिट्टी बनती है जो कृषि के लिए अधिक उपयोगी नहीं होती है अरकान कम के चट्टानों के प्रदेश में हल्की रेतीली मिट्टी का बहुमूल्य होता है जिससे मोटे अनाज की फसले उत्पादित की जाती है छत्तीसगढ़ की अर्थव्यवस्था पर यहां की चट्टानों का महत्वपूर्ण योगदान है क्योंकि खनिजे संपदा विभिन्न प्रकार की चट्टानों की संरचना और चट्टानों के मौलिक पदार्थों के आधार पर यहां की विविध प्रकार की मिट्टियों का विकास होता है और मिशन पर कृषि निर्भर करती है जो मानव के लिए भोजन का मुख्य आधार है प्राचीन आर्चाइयां एवं हड़प्पा सेल समूह का विस्तार राज्य के अधिकांश भागों में मिलता है इसके अलावा धरवाड़ गोंडवाना ढक्कन लामेटा प्रस्तर रियो लाइट लेटराइट पुरातन अल्युमिनियम शैल समूह का छीट पुट विस्तार पाया जाता है

आधारी शैली- छत्तीसगढ़ के सेल समूह का सामान्य वितरण निम्न अनुसार है

आध महाकल्प – जेडी दाना ने इसे अड्डा महाकल्प नाम से निरूपित किया था वह सेलक्रम पृथ्वी के आधारभूत चट्टानी है कुछ चट्टानें लव जनित अधिक गहराई पर मिलती है जिनमें जीव शीशों का अभाव पाया जाता है छत्तीसगढ़ में इस योग की मुख्य चट्टानें ग्रेनाइट माइकासिस्ट आदि है तथा यह प्रदेश के 50% भाग में विस्तृत है जैसे कि उत्तरी पूर्वी भाग में लुत्र बगीचा पत्थलगांव समरी कुनकुरी जशपुर घरघोड़ा सीतापुर अंबिकापुर कथा उत्तरी पश्चिमी भाग में कोटा पिंडरा लोरमी और दक्षिणी भाग में महासमुंद राजिम धमतरी कुरूद गरियाबंद बालोद तथा कोटा तहसीलों में मिलता है

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धारवाड़ शैल समूह – इस समूह की सिल में जीवाश्म नहीं पाए जाते राज्य की बाहरी सीमा पर चारों ओर धरवाड़ समूह की सिल का विस्तार मिलता है यह सेलक्रम बिखरे हुए रूप में बहुत कम क्षेत्र में मिलता है इसलिए सिस्ट कांगोलोमेरेट तथा नी इस समूह की प्रमुख शैली है वही राज्यों में इस समूह की सिल का विस्तार जगदलपुर कसडोल भानु प्रतापपुर दंतेवाड़ा मोहल्ला कवर्धा पाली तथा पंडरिया तहसीलों में पाया जाता है नारायणपुर भानु प्रताप तहसीलों में आई डोंगरी दंतेवाड़ा में बैलाडीला क्षेत्र तथा नारायणपुर में अबूझ मंद पहाड़ी के उत्तर इस सेल समूह का विस्तार पाया जाता है

( 1 )चिल्फी घाटी श्रृंखला – एस श्रृंखला रतनपुर के उत्तर से प्रारंभ होकर मैं कल पश्चिम तक व्यवस्थित रूप में मिलती है शिल्पी घाटी श्रृंखला का विस्तार बिलासपुर जिले के सिस्ट सेल क्षेत्र में उत्तरी से दक्षिणी पश्चिमी दिशा में है यह उत्तर में सीधी लेकिन दक्षिण सीमा पर अंकित एवं लहर युक्त है श्रृंखला में अंगूठी कारण ग्रिट कारलाइट मैंगनीज अयस्क सिस्ट सेल पाए जाते हैं बता दे की मध्यवर्ती भाग में दक्कन ट्रैप अंतर्वेधन मिलते हैं इसमें हाईलाइट एवं आईलेट की मोती बिक्री पढ़ने होती है जो श्रृंखला नहीं बंद होती है इसमें हरे रंग के ग्रीडर्स पाए जाते हैं

(2 ) सोना खान श्रृंखला- एच स्मिथ ने सोना खान श्रृंखला नाम दिया है यह श्रृंखला महानदी के दक्षिणी भाग में उंगलियों के आकार में मिलती है यह निस में दासी पाई जाती है लोह अयस्क श्रृंखला। छत्तीसगढ़ के दक्षिण पश्चिम भाग में स्थित दल्ली राजहरा की पहाड़ियों में हेमेटाइट लोह अयस्क तथा पिंडों के रूप में मिलती है इस श्रृंखला से प्राप्त लोह अयस्क भिलाई लोह इस्पात कारखाने को भेजा जाता है

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कडापा शैलक्रम

छत्तीसगढ़ प्रदेश में इस क्रम का विस्तार 32.428 वर्ग किलोमीटर में है इसमे सेल स्लेट चूना पत्थर डोलोमाइट बहुदया से मिलते हैं जगदलपुर महासमुंद सरायपाली नवागढ़ पाटन डम डम दुर्गा भाटापारा तिल्दा बलौदा बाजार भिलाई का रायगढ़ सारंगढ़ डबरा शक्ति जांजगीर चांपा तथा बिलासपुर तखतपुर तहसीलों में इस क्रम का सर्वाधिक विस्तार पाया जाता है

गोंडवाना सेल समूह

मध्य प्रदेश के गोंडवाना क्षेत्र में इसकी अध्ययन का सूत्रपात हुआ है जिस कारण इस प्रकार के शेरों के क्रम को गोंडवाना क्रम कहा गया है लोह अयस्क एवं कोयले की उपस्थिति के लिए यह शैल क्रम विशेष महत्व रखता है यह क्रम प्रदेश के लगभग 17 प्रतिशत क्षेत्रफल में एक पट्टी के रूप में विस्तृत है गोंडवाना सेल्स समूह की दिन श्रृंखलाएं हैं

ऊपरी गोंडवाना हिमगिरी श्रृंखला

बराकर श्रृंखला। छत्तीसगढ़ के उत्तरी उच्च भूमि में हसदेव मंद तथा किलो नदी घाटियों गोंडवाना शैल समूह की बराकर श्रेणी विस्तृत हैतालचर श्रृंखला छत्तीसगढ़ की उतरी उच्च भूमि में हंस दो मंद तथा किलो नदी घाटियों गोंडवाना शैल समूह की बराकर श्रेणी विस्तृत है

 

 इस वजह से दिसंबर- जनवरी माह में तापमान कम हो जाता है 

दिसंबर जनवरी माह में सूर्य के दक्षिणायन होने के कारण तापमान बहुत कम हो जाता है भारत के उत्तरी भागों के समान यह शीत ऋतु में पश्चिमी विकशॉप उत्पन्न होने लगता है यह प्रदेश भी उत्तर की बर्फीली हवाओं की चपेट में आ जाता है जिससे तापमान एकाएक गिर जाता है दिसंबर माह में प्रदेश का न्यूनतम तापमान ऊंचे पहाड़ी भागों में पेंड्रा रोड जयपुर नगर में अंकित किया जाता है जहां 4अंश सेंटीग्रेड से 6 अंश सेंटीग्रेड के मध्य तापमान पाया जाता है दिसंबर माह में अंबिकापुर में 8. 6 अंश सेंटीग्रेड पेंड्रा में 10.8 अंश सेंटीग्रेड जगदलपुर में 2.0 अंश सेंटीग्रेड कांकेर में 12.1 अंश सेंटीग्रेड तापमान रहता है इसके अलावा पेन ड्राइव छोरी पहाड़िया रायपुर उच्च भूमि तथा जयपुर पाठ अधिक ऊंचाई पर स्थित होने तथा वना के कारण औसत वार्षिक तापमान कम …