धर्मांतरण कानून के खिलाफ रायपुर में मसीही समाज ने निकाली विशाल मशाल रैली



रायपुर। छत्तीसगढ़ विधानसभा से पारित हुए ‘धर्म स्वातंत्र्य विधेयक 2026’ के खिलाफ प्रदेश के मसीही समाज ने अपना विरोध तेज कर दिया है। रविवार, 22 मार्च को राजधानी के बूढ़ा तालाब क्षेत्र से संयुक्त मसीही समाज के बैनर तले एक विशाल और शांतिपूर्ण मशाल रैली निकाली गई, जिसमें हजारों की संख्या में समाज के लोग शामिल हुए। इस रैली के माध्यम से समाज ने नए कानून के कई प्रावधानों को लेकर अपनी गहरी चिंता और असहमति व्यक्त की है। प्रदर्शन के अंत में महामहिम राज्यपाल के नाम एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा गया, जिसमें विधेयक की धाराओं पर पुनर्विचार करने और धार्मिक स्वतंत्रता को अक्षुण्ण बनाए रखने की मांग की गई है।
मसीही समाज के प्रतिनिधियों का कहना है कि यह विधेयक अपने वर्तमान स्वरूप में धर्म की स्वतंत्रता को सुरक्षित करने के बजाय उसे प्रशासनिक नियंत्रण में लाने का प्रयास करता है। समाज की सबसे बड़ी आपत्ति विधेयक में इस्तेमाल की गई शब्दावली को लेकर है, जहाँ ‘प्रलोभन’, ‘प्रभाव’ और ‘कपटपूर्ण साधन’ जैसे शब्दों की परिभाषा को बेहद व्यापक और अस्पष्ट रखा गया है। चिंता जताई गई है कि इन अस्पष्ट परिभाषाओं के कारण सामान्य धार्मिक गतिविधियाँ और वर्षों से किए जा रहे सेवा कार्य भी भविष्य में विवादों और कानूनी कार्रवाइयों की चपेट में आ सकते हैं। समाज का मानना है कि अस्पताल, स्कूल और राहत कार्यों जैसी निस्वार्थ सामाजिक सेवाओं को भी ‘प्रलोभन’ के दायरे में लाना जनहित के कार्यों को संदिग्ध बनाने जैसा है।
कानूनी और संवैधानिक आधार पर भी इस विधेयक को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। जानकारों का कहना है कि धर्म परिवर्तन से पहले सूचना देना और फिर प्रशासन द्वारा उसका सत्यापन व सार्वजनिक प्रकाशन करना, व्यक्ति के निजी अधिकारों और निजता का सीधा उल्लंघन है। इससे न केवल व्यक्तिगत गरिमा प्रभावित होती है, बल्कि जानकारी सार्वजनिक होने पर संबंधित व्यक्ति की सुरक्षा और सामाजिक स्थिति पर भी खतरा बढ़ सकता है। इसके साथ ही, भारतीय न्याय व्यवस्था के ‘निर्दोषता के सिद्धांत’ के विपरीत, इस विधेयक के कुछ प्रावधानों में निर्दोष साबित करने की जिम्मेदारी स्वयं व्यक्ति पर डाल दी गई है, जिसे न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ माना जा रहा है।
विधेयक में 10 वर्ष से लेकर आजीवन कारावास तक की कड़ी सज़ा का प्रावधान किया गया है, लेकिन इसकी तुलना में झूठे आरोप लगाने वालों के खिलाफ किसी ठोस दंड की व्यवस्था नहीं दी गई है। मसीही समाज का तर्क है कि इससे कानून के दुरुपयोग की संभावनाएँ बढ़ जाएँगी और व्यक्तिगत रंजिश या सामाजिक दबाव के चलते निर्दोष लोगों को प्रताड़ित किया जा सकेगा। समाज की मांग है कि यदि कोई व्यक्ति गलत मंशा से झूठी शिकायत करता है, तो उसे भी उतनी ही कठोर सज़ा मिलनी चाहिए। मशाल रैली के दौरान यह संदेश दिया गया कि कानून का उद्देश्य संरक्षण होना चाहिए, न कि समाज में डर और भ्रम का वातावरण निर्मित करना।
गौरतलब है कि इसी तरह के धर्मांतरण विरोधी कानूनों को लेकर देश के सर्वोच्च न्यायालय में भी बहस जारी है और कई राज्यों को नोटिस जारी किए जा चुके हैं। मसीही समाज ने राज्यपाल को सौंपे ज्ञापन में इन्हीं संवैधानिक बिंदुओं का हवाला देते हुए कहा है कि जब मामला न्यायपालिका के विचाराधीन है, तब ऐसे कठोर प्रावधान लाना उचित नहीं है। समाज ने स्पष्ट किया है कि वे संविधान के अनुच्छेद 25, 14 और 21 के तहत मिलने वाली धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत अधिकारों के प्रति अपनी चिंता व्यक्त कर रहे हैं और सरकार से इन संवेदनशील बिंदुओं पर दोबारा विचार करने की अपील करते हैं।









